बस्तर संभाग की केंद्रीय जेल जगदलपुर से पिछले कुछ दिनों में सामने आई घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है। एक ओर महिला बंदी की कथित आत्महत्या और दूसरी ओर बंदी रमेश कुंजाम की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु ने जेल प्रशासन, जिला प्रशासन, राज्य सरकार तथा जेल विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
जेल कोई दंडात्मक मृत्यु केंद्र नहीं, बल्कि कानून के शासन के अंतर्गत संचालित एक संवैधानिक संस्था है, जहां बंदियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की रक्षा करना राज्य का दायित्व है। यदि राज्य की अभिरक्षा में रह रहे व्यक्तियों की लगातार मृत्यु हो रही है, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त “जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार” पर भी गंभीर प्रश्न है।
बस्तर अधिकार मुक्ति मोर्चा एवं जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) यह स्पष्ट रूप से मानते हैं कि किसी भी बंदी का अपराध, विचारधारा, मुकदमा या सामाजिक पृष्ठभूमि उसके मौलिक अधिकारों को समाप्त नहीं करती। राज्य की हिरासत में प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी राज्य सरकार और जेल प्रशासन की होती है।
राज्य सरकार से हमारे सीधे सवाल
1. पांच दिनों के भीतर दो बंदियों की मृत्यु कैसे हुई?
2. क्या राज्य सरकार ने केंद्रीय जेल जगदलपुर की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य व्यवस्था का कभी स्वतंत्र ऑडिट कराया?
3. क्या जेलों में पर्याप्त चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और सुरक्षा कर्मी उपलब्ध हैं?
4. क्या राज्य सरकार इन घटनाओं की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी स्वीकार करेगी?
जेल प्रशासन एवं विभागीय अधिकारियों से सवाल
1. महिला बंदी की आत्महत्या जैसी घटना जेल परिसर के भीतर कैसे हुई?
2. क्या संवेदनशील एवं मानसिक तनावग्रस्त बंदियों की पहचान और निगरानी की व्यवस्था थी?
3. रमेश कुंजाम की दुर्घटना के बाद तत्काल चिकित्सा सहायता देने में कितना समय लगा?
4. क्या घटना के समय सभी सीसीटीवी कैमरे कार्यरत थे?
5. क्या जेल मैनुअल और मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 का पालन किया जा रहा था?
जिला प्रशासन एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों से सवाल
1. क्या केंद्रीय जेल का नियमित निरीक्षण किया गया?
2. क्या जिला स्तरीय निगरानी समितियां सक्रिय हैं?
3. क्या क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों ने जेल व्यवस्था की समीक्षा की?
4. क्या पीड़ित परिवारों से मिलकर न्याय दिलाने की पहल की गई?
संवैधानिक एवं कानूनी पहलू
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक निर्णयों में कहा है कि जेल में बंद व्यक्ति भी मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं होता।
जेल अधिनियम 1894, मॉडल प्रिजन मैनुअल 2016 तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से बंदियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, निगरानी, मानसिक स्वास्थ्य सहायता तथा हिरासत में हुई मृत्यु की स्वतंत्र जांच की व्यवस्था का प्रावधान करते हैं।
यदि इन नियमों के पालन में लापरवाही हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई होना अनिवार्य है।
हमारी प्रमुख मांगें
1. उच्च स्तरीय न्यायिक जांच
केंद्रीय जेल जगदलपुर में हुई दोनों मौतों की जांच उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अथवा जिला एवं सत्र न्यायाधीश स्तर की स्वतंत्र समिति से कराई जाए।
2. जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई
जांच पूर्ण होने तक संबंधित अधिकारियों को प्रशासनिक दायित्वों से पृथक किया जाए तथा दोष सिद्ध होने पर कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए।
3. पीड़ित परिवारों को न्याय एवं मुआवजा
दोनों मृतकों के परिवारों को उचित आर्थिक सहायता, मुआवजा तथा कानूनी सहायता प्रदान की जाए।
4. सीसीटीवी एवं दस्तावेज सुरक्षित किए जाएं
संपूर्ण सीसीटीवी फुटेज, मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट एवं जांच दस्तावेज संरक्षित कर स्वतंत्र जांच एजेंसी को उपलब्ध कराए जाएं।
5. बस्तर संभाग के सभी जेलों का विशेष ऑडिट
जगदलपुर, दंतेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर, बीजापुर, सुकमा, कोंडागांव एवं अन्य जेलों का सुरक्षा, स्वास्थ्य, मानवाधिकार एवं प्रशासनिक ऑडिट कराया जाए।
6. जेल सुधार अभियान
जेलों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता, नियमित चिकित्सा परीक्षण, मानवाधिकार संरक्षण तंत्र तथा आधुनिक निगरानी व्यवस्था को अनिवार्य रूप से मजबूत किया जाए।
हमारा स्पष्ट मत
यदि राज्य की अभिरक्षा में रहने वाले व्यक्तियों का जीवन सुरक्षित नहीं है, तो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बस्तर अधिकार मुक्ति मोर्चा एवं जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने, दोषियों की जवाबदेही तय कराने और बस्तर संभाग की जेल व्यवस्था में व्यापक सुधार हेतु जनआंदोलन एवं लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेंगे।
हम राज्य सरकार, जेल मंत्री, विभागीय सचिव, जिला प्रशासन एवं संबंधित अधिकारियों से मांग करते हैं कि वे इस मामले को मात्र विभागीय औपचारिकता न समझें, बल्कि इसे मानवाधिकार, संवैधानिक दायित्व और न्याय के प्रश्न के रूप में देखें।
न्याय, जवाबदेही और मानवाधिकारों की रक्षा ही लोकतंत्र की वास्तविक पहचान है।
— नवनीत चाँद
मुख्य संयोजक, बस्तर अधिकार मुक्ति मोर्चा
बस्तर संभाग अध्यक्ष, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे)