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पारंपरिक मकान आज भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा, शहरों से गायब हो चुकी ये विरासत।

मानसून से पहले गांवों में खपरैल छाने की धूम, टपकती छतों की हो रही मरम्मत

पारंपरिक मकान आज भी ग्रामीण जीवन का हिस्सा, शहरों से गायब हो चुकी ये विरासत

दुर्गूकोंदल / मानसून की दस्तक से पहले ग्रामीण इलाकों में खपरैल छाने और पुराने मकानों की मरम्मत का काम तेज हो गया है। सालभर आंधी-तूफान और तेज हवाओं से टूटी-फूटी खपरैलों को बदला जा रहा है, ताकि बरसात में घरों की छत न टपके।गांवों में सुबह से लेकर शाम तक खपरैल मिस्त्री और मजदूर छतों पर जुटे हैं। पुरानी खपरैल उतारकर नई लगाई जा रही है, टूटी कड़ियां बदली जा रही हैं। लोगों की कोशिश है कि पहली बारिश से पहले घर पक्के हो जाएं, वरना बरसात में फूस टपकने से घर का सारा सामान खराब हो जाता है।एक समय था जब खपरैल वाले मकान शहर और गांव दोनों की पहचान थे। लेकिन बदलते समय और सीमेंट-कंक्रीट, लेंटर की आधुनिक तकनीक ने शहरों से इन मकानों को लगभग खत्म कर दिया। अब खपरैल वाले घर मुख्य रूप से गांवों में ही दिखते हैं। ग्रामीण इलाकों में भी अब नए मकान ज्यादातर मकान सीमेंट-कंक्रीट और लेंटर वाले बन रहे हैं। फिर भी कई परिवार अपने पूर्वजों की विरासत और पारंपरिक जीवनशैली को बचाए रखने के लिए खपरैल वाले घरों में रहना पसंद कर रहे हैं। ठंडी छत, प्राकृतिक इन्सुलेशन और कम लागत इन घरों की खासियत है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि खपरैल की छत गर्मी में ठंडी और सर्दी में गर्म रहती है। बिजली भी कम लगती है। हालांकि हर साल मरम्मत का खर्च आता है, लेकिन पुरखों की निशानी छोड़ने का मन नहीं करता।मानसून शुरू होते ही इन मरम्मतों का असर दिखेगा। टपकती छतें बंद होंगी और ग्रामीण घर फिर से बरसात के लिए तैयार हो जाएंगे।

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