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* मददेड में आस्था का महापर्व: पीढ़ियों से चली आ रही ‘गम्पा जातरा’ की अनूठी परंपरा, गांव की खुशहाली के लिए सरहद पार छोड़े जाते हैं ‘कलेश’* दीपक मरकाम की खबर,,,

  1. * मददेड में आस्था का महापर्व: पीढ़ियों से चली आ रही ‘गम्पा जातरा’ की अनूठी परंपरा, गांव की खुशहाली के लिए सरहद पार छोड़े जाते हैं ‘कलेश’* दीपक मरकाम की खबर,,,

मददेड (बीजापुर)।

बस्तर अंचल के बीजापुर जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत मददेड में पारंपरिक आस्था, लोक संस्कृति और अनूठी विरासत का प्रतीक ‘गम्पा जातरा’ (गाम देवी जातरा) पर्व पूरी श्रद्धा, उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सदियों पुरानी इस धार्मिक परंपरा को लेकर बुजुर्गों और ग्रामीणों में आज भी अटूट विश्वास और अगाध श्रद्धा है।

वर्षा ऋतु से पूर्व आयोजन और सर्वधर्म समभाव की मिसाल,

यह ऐतिहासिक पर्व हर वर्ष वर्षा ऋतु (मानसून) के आगमन से कुछ दिन पहले आयोजित किया जाता है, ताकि आने वाली खेती-किसानी का सीजन बेहतर रहे। इस महापर्व की सबसे खूबसूरत विशेषता यह है कि इसमें किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होता; गांव के सभी जाति और धर्मों के लोग पूरी आस्था के साथ माता के इस पूजन में बढ़-चढ़कर शामिल होते हैं और अपनी सहभागिता निभाते हैं।

*पीढ़ियों पुरानी परंपरा, जनसहयोग से भव्य आयोजन*

ग्राम पंचायत मददेड के निवासी 55 वर्षीय ग्रामीण किस्टैया ने इस परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि, “यह गम्पा जातरा हमारे जन्म से भी पहले, हमारे पूर्वजों के समय से यानी कई पीढ़ियों से इसी तरह निरंतर मनाई जा रही है। इस महापर्व के सफल संचालन के लिए किसी बाहरी या सरकारी मदद के बजाय, गांव के हर एक घर से आपसी सामंजस्य के साथ चंदा (स्वैच्छिक दान) इकट्ठा किया जाता है।” यह सामूहिक सहभागिता ग्रामीण स्तर पर आज भी एकता को दर्शाती है।

*तेलुगु संस्कृति में ‘मारेयम्मा माता’ के रूप में पूजनीय*

इस भव्य जातरा में मुख्य रूप से ग्राम देवी की आराधना की जाती है। स्थानीय भाषा और तेलुगु प्रभाव वाले इस सीमावर्ती क्षेत्र में इन्हें ‘मारेयम्मा माता’ के नाम से जाना और बड़ी श्रद्धा से पूजा जाता है। गांव के पारंपरिक ग्राम देवी पुजारी, जिन्हें स्थानीय व्यवस्था में ‘पेरमा’ (पेरमेहया) कहा जाता है, उनके द्वारा पूरे विधि-विधान, पारंपरिक रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के साथ माता जी की पूजा-अर्चना संपन्न कराई जाती है। हर वर्ष इस अवसर पर माता जी की पूजा बहुत ही धूमधाम से की जाती है।

*पूजा का मुख्य उद्देश्य: सुख-शांति, समृद्धि और रोग-दोष से मुक्ति*

प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली इस विशेष पूजा के पीछे ग्रामीणों की गहरी आध्यात्मिक और लोक कल्याणकारी सोच छिपी हुई है। माता मारेयम्मा की इस आराधना का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:

ग्राम के समस्त ग्रामीणों, छोटे बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य की रक्षा हो।

पालतू पशुओं, मवेशियों और जानवरों में किसी भी प्रकार की महामारी या बीमारी न फैले।

खेतों और खलिहानों की सुरक्षा हो ताकि फसल की पैदावार अच्छी हो।

गांव में किसी प्रकार का कोई रोग, विकार, संकट या प्राकृतिक आपदा न आए।

क्षेत्र में खुशहाली, सुख-शांति बनी रहे और कृषि कार्य के लिए बरसात (मानसून) पूर्ण रूप से और समय पर हो।

‘कलेश’ (पीड़ा/गतर) और कचरा बाहर करने की अनूठी रस्म,

इस पर्व की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विशेषता यह है कि ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, घर-परिवार की हर परेशानी, बीमारी, आपसी कलह और नकारात्मक ऊर्जा को भौतिक रूप से घर से बाहर निकाला जाता है। इस पूजा में घर-घर से प्रत्येक व्यक्ति की यही सोच होती है कि उनके जीवन की हर मुसीबत दूर हो जाए।

स्थानीय स्तर पर और तेलुगु भाषा में इस क्लेश या संकट को ‘पीड़ा’ या ‘गतर’ कहा जाता है। इस पीड़ा (कलेश) को दूर करने के लिए प्रत्येक परिवार अपने घर से:

फटा हुआ टोकना (बांस की पुरानी टोकरी)

पुरानी रस्सी

टूटा या घिसा हुआ झाड़ू (चटा झाड़ू)

छोटा सा बांस नुमा टुकड़ा और उस पर बंधा कपड़े का झंडा

इन सभी सामग्रियों को अपने-अपने घर के ‘क्लेश, पीड़ा और दरिद्रता’ का प्रतीक मानकर ग्रामीण बड़ी आस्था के साथ अपने घरों से ले जाकर मंदिर प्रांगण में एक निश्चित स्थान पर लाकर रखते हैं।

*बाजे-गाजे के साथ सरहद पर विसर्जन और समापन*

पूजा के अंतिम और मुख्य चरण में, मंदिर समिति के सदस्यों और ग्रामीणों द्वारा इस पूरे एकत्रित सामान (प्रतीकात्मक कचरे और क्लेश) को एक जगह जमा किया जाता है। इसके बाद पारंपरिक बाजे-गाजे, ढोल-नगाड़ों और वाद्य यंत्रों की थाप पर भारी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी में विधि-विधान से पूजा-पाठ आरंभ किया जाता है।

इस पूरे प्रतीकात्मक क्लेश और कचरे को जुलूस की शक्ल में गांव की सरहद (सीमा) पर ले जाया जाता है। सरहद पर दो बांस गाड़कर और आम के पत्तों का सुंदर तोरण बनाकर एक द्वार तैयार किया जाता है। इसके बाद पूरे विधि-विधान के साथ गांव-गांव के क्लेश (पीड़ा/गतर) और कचरे को सरहद के पार (बाहर) छोड़ दिया जाता है और इसी के साथ पूजा का समापन होता है। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि इस रस्म के बाद गांव की सीमा के भीतर कोई भी बीमारी, बुरी शक्ति या संकट प्रवेश नहीं कर पाता और पूरा गांव साल भर खुशहाल और सुरक्षित रहता है।

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