*बैलों के सम्मान में झुकता है किसान का सिर, खेतों के साथी को मिलता है सम्मान
कृषि संस्कृति का अनूठा लोकपर्व — बैल पूजा के साथ प्रकृति, धरती और पशुधन के प्रति कृतज्ञता का संदेश*
*पोला पर्व विशेष रिपोर्ट RK bharat news सहायक सम्पादक दीपक मरकाम, संवाददाता तेज नारायण सिंह की खबर,*
ग्रामीण अंचल पोला पर्व भारतीय ग्रामीण एवं कृषि संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण लोकपर्व है।
यह त्योहार उन बैलों के सम्मान में मनाया जाता है, जो सदियों से किसान के खेत और कृषि जीवन के अभिन्न साथी रहे हैं। किसान के लिए बैल केवल पशु नहीं, बल्कि खेती-किसानी की मेहनत में साथ देने वाला परिवार का सदस्य माना जाता रहा है।
पोला के अवसर पर बैलों को कृषि कार्य से विश्राम दिया जाता है। उन्हें स्नान कराकर साफ-सुथरा किया जाता है, उनके सींगों को रंग-बिरंगे रंगों से सजाया जाता है तथा गले में घंटियां, फूलों की माला और पारंपरिक सजावटी सामग्री पहनाई जाती है। इसके बाद किसान अपने बैलों की पूजा-अर्चना कर उन्हें विशेष भोजन कराता है।
क्यों मनाया जाता है पोला?
पोला पर्व का मूल उद्देश्य कृषि कार्य में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले बैलों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना है। वर्षभर किसान के साथ खेतों में मेहनत करने वाले बैलों को इस दिन आराम दिया जाता है और उनकी विशेष देखभाल की जाती है।
यह पर्व किसान को प्रकृति और पशुधन के साथ अपने रिश्ते को याद करने का अवसर भी देता है। खेत, मिट्टी, पानी, वर्षा, पशुधन और किसान—इन सभी के आपसी संबंध से ही ग्रामीण कृषि जीवन आगे बढ़ता है।
बैल पूजा से जुड़ी सदियों पुरानी परंपरा
पोला के दिन ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही उत्सव का वातावरण दिखाई देने लगता है।
घरों और पशुशालाओं की साफ-सफाई की जाती है।
बैलों को नहलाकर सजाया जाता है और उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है।
कई स्थानों पर बैलों की पूजा कर उन्हें तिलक लगाया जाता है और आरती उतारी जाती है। इसके बाद उन्हें गुड़, रोटी, अनाज, चारा तथा स्थानीय परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार के पकवान खिलाए जाते हैं।
बच्चों में भी रहता है विशेष उत्साह
पोला पर्व का आकर्षण बच्चों में भी देखने को मिलता है।
बच्चे मिट्टी और लकड़ी से बने छोटे बैलों को सजाते हैं तथा पारंपरिक खेलों में हिस्सा लेते हैं।
इस परंपरा के माध्यम से नई पीढ़ी को ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति से जोड़ने का अवसर मिलता है।
गांवों में दिखता है उत्सव और भाईचारे का रंग
पोला केवल बैल पूजा तक सीमित नहीं है।
यह ग्रामीण समाज में सामूहिकता, भाईचारे और आपसी मेल-जोल का पर्व भी है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं और पारंपरिक पकवानों का आनंद लेते हैं।
कई गांवों में सजे-धजे बैलों को देखने के लिए ग्रामीण एकत्र होते हैं। इससे पूरे गांव में उत्सव और उमंग का माहौल बन जाता है।
आधुनिक दौर में भी नहीं बदला भाव
आज खेती के क्षेत्र में आधुनिक मशीनों और तकनीक का उपयोग बढ़ गया है।
ट्रैक्टर और अन्य कृषि उपकरणों ने खेती का स्वरूप काफी बदल दिया है। इसके बावजूद पोला पर्व का महत्व ग्रामीण समाज में कायम है।
यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता के साथ अपनी लोक संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति सम्मान को भी जीवित रखना जरूरी है।
पोला पर्व का संदेश
“खेत में जिसने किसान का साथ दिया, पोला उसी साथी के सम्मान का पर्व है।”
पोला किसान की मेहनत, बैलों के योगदान और धरती के प्रति कृतज्ञता की ऐसी परंपरा है, जो ग्रामीण भारत की जीवंत संस्कृति को आज भी अपने भीतर संजोए हुए है।
विशेष बॉक्स | पोला में क्या-क्या होता है?
बैलों को कृषि कार्य से विश्राम
बैलों को स्नान कराकर साफ-सफाई
सींगों और शरीर की विशेष सजावट
फूलों की माला एवं घंटियों से श्रृंगार
विधि-विधान से बैल पूजा एवं आरती
गुड़, रोटी, अनाज व चारे का विशेष भोजन
परिवार और ग्रामीण समाज में सामूहिक उत्सव
बच्चों द्वारा मिट्टी/लकड़ी के बैलों से पारंपरिक खेल
लोकसंस्कृति की पहचान
पोला पर्व केवल बैलों की पूजा नहीं, बल्कि किसान और उसके पशुधन के बीच सदियों पुराने आत्मीय रिश्ते, कृषि परंपरा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का जीवंत प्रतीक है।

