मनीष कौशिक
मोहला-मानपुर—- जिले में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली और सरकारी मदों के खर्च को लेकर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस विधायक इंद्र शाह मंडावी ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि जिन इलाकों में बच्चे सुरक्षित स्कूल भवन के लिए तरस रहे हैं, जहां सड़कें गड्ढों में तब्दील हैं और गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है, वहां विकास की प्राथमिकताएं कथित तौर पर बदल गई हैं।विधायक ने सवाल उठाया कि क्या विकास का मतलब ओपन जिम, वर्चुअल क्लास और हजारों दीयों तक सीमित रह गया है? उनका कहना है कि यदि सरकारी राशि वास्तव में जनहित के लिए है तो उसकी पहली प्राथमिकता जर्जर स्कूल भवन, शिक्षक, सड़क, पेयजल, नाली और अन्य जरूरी सुविधाएं होनी चाहिए।
*‘जहां छत नहीं, वहां जिम किस काम का?’*
विधायक ने जिले के 50 से अधिक जर्जर स्कूल भवनों का हवाला देते हुए कहा कि कई स्थानों पर बच्चे किराए के भवन, बरामदे, रंगमंच अथवा पेड़ों की छांव में पढ़ने को मजबूर हैं। ऐसे में स्कूल परिसरों में लाखों रुपये खर्च कर ओपन जिम स्थापित करने के निर्णय पर उन्होंने सवाल खड़ा किया।विधायक के मुताबिक शेरपार, हथरा, ईरागांव, कोसमी, भावसा, कुम्हारी और खड़गांव के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में लगभग 11.30 लाख रुपये प्रति स्कूल, यानी कुल करीब 79.10 लाख रुपये खर्च किए गए। उन्होंने पूछा कि जब स्कूलों की मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं हैं, तब ऐसी योजनाओं को प्राथमिकता क्यों दी गई?
*वर्चुअल क्लास के नाम पर करोड़ों नहीं, लेकिन लाखों का सवाल जरूर*
कौड़िकसा, गोटाटोला, दनगढ़ और भरीटोला के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में वर्चुअल क्लास के लिए लगभग25-25 लाख रुपये, कुल करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा विधायक ने किया है। उनका आरोप है कि विषय विशेषज्ञ और तकनीकी सहायता की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से इन कक्षाओं की उपयोगिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।यहां सबसे बड़ा सवाल यही है अगर करोड़ों की तकनीक लगाई जा रही है तो उसे चलाने के लिए विशेषज्ञ और व्यवस्था क्यों नहीं?
*DMF की राशि पर विधायक का सीधा सवाल—पहले जरूरत या पहले दिखावा?*
जिला खनिज न्यास (DMF) की राशि के उपयोग को लेकर विधायक ने सरकार से प्राथमिकताओं पर जवाब मांगा है। उनका कहना है कि खनिज प्रभावित क्षेत्र के बच्चों को सुरक्षित स्कूल भवन और बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए।उन्होंने आरोप लगाया कि जनहित की जरूरत और योजनाओं की प्राथमिकता के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।विधायक ने सरकार और प्रशासन से यह स्पष्ट करने की मांग की कि DMF की राशि तय करने के दौरान किन आधारों पर इन कार्यों को प्राथमिकता दी गई।
*दीयों की रोशनी पर सवाल—‘गांवों में विकास की रोशनी कब?’*
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर पंचायतों में दीये जलाने की तैयारियों को लेकर भी विधायक ने सवाल उठाए। विधायक के अनुसार जिले में करीब 1.20 लाख दीये जलाने की तैयारी है। उन्होंने अनुमानित तेल और दीयों की लागत का हवाला देते हुए पूछा कि जब पंचायतें आर्थिक दबाव में हैं, तब ऐसे आयोजन के लिए राशि और संसाधन खर्च करना कितना उचित है?विधायक ने कहा कि जनता को प्रतीकात्मक रोशनी से ज्यादा गांव की सड़क, स्कूल, पानी और नाली में वास्तविक रोशनी चाहिए।
*अब सरकार से विधायक के सीधे सवाल*
50 से अधिक जर्जर स्कूलों की मरम्मत और पुनर्निर्माण की प्राथमिकता कब तय होगी? जिन स्कूलों में वर्चुअल क्लास लगाई गई हैं, वहां विषय विशेषज्ञ और तकनीकी स्टाफ की व्यवस्था क्यों नहीं? DMF की राशि से ओपन जिम लगाने का आधार क्या था?जर्जर भवनों वाले स्कूलों में पहले भवन जरूरी था या ओपन जिम? निर्माणाधीन सड़कों की गुणवत्ता और धीमी गति पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी? पंचायतों की आर्थिक स्थिति के बीच दीप प्रज्ज्वलन के लिए राशि और संसाधनों का इस्तेमाल किस मद से होगा?क्या सरकार इन खर्चों और स्वीकृतियों का पूरा हिसाब सार्वजनिक करेगी?
*‘दीया जलाने से पहले स्कूल की छत बचाइए’*
विधायक मंडावी ने कहा कि सरकार को योजनाओं और आयोजनों से ज्यादा जमीनी जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए। उनका कहना है कि जिस जिले में बच्चे सुरक्षित भवन के अभाव में पेड़ों की छांव और बरामदे में पढ़ रहे हों, वहां विकास की असली कसौटी यह होनी चाहिए कि बच्चों को कब सुरक्षित स्कूल मिलेगा, गांवों की सड़क कब सुधरेगी और शिक्षकों की कमी कब दूर होगी।विधायक का तंज था—“सरकार अगर सचमुच विकास की रोशनी दिखाना चाहती है, तो पहले उन स्कूलों में रोशनी पहुंचाए जहां बच्चे आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए इंतजार कर रहे हैं।”

