*बस्तर दशहरा: सिरहासार भवन में आस्था के साथ संपन्न हुई ऐतिहासिक ‘जोगी बिठाई’ की रस्म*
*दशहरे के निर्विघ्न आयोजन और बस्तर की सुख-समृद्धि के लिए 4 फीट गहरे गड्ढे में 9 दिनों की कठिन तप साधना में बैठे ग्राम बड़े आमाबाल के दौलत*
बस्तर सम्भाग जगदलपुर:12 अक्टूबर 2026
विश्व प्रसिद्ध एवं 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा महापर्व के अंतर्गत शारदीय (क्वार) नवरात्रि के प्रथम दिवस पर अत्यंत महत्वपूर्ण और अनूठी ‘जोगी बिठाई’ की रस्म पूरे विधि-विधान और पारंपरिक गरिमा के साथ सिरहासार भवन में संपन्न हो गई। बस्तर अंचल की सुख-समृद्धि, शांति और दशहरा पर्व के निर्विघ्न समापन की कामना को लेकर ग्राम बड़े आमाबाल (हल्बा समुदाय) के युवा दौलत इस वर्ष लगातार तीसरी बार 9 दिनों की अत्यंत कठिन तप साधना पर बैठे हैं।
*मां मावली मंदिर से पूजा-अर्चना के बाद सिरहासार पहुंचे जोगी*
करीब 600 वर्षों की समृद्ध लोक-आस्था को समेटे इस परंपरा की शुरुआत शाम को मावली मंदिर में पुजारी द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजा-अर्चना के साथ हुई। देवी की आराधना के पश्चात वहां स्थापित पवित्र तलवार का विधिवत पूजन किया गया। इसके बाद जोगी दौलत इसी पावन तलवार को धारण कर पारंपरिक मुंडाबाजा और गाजे-बाजे की मंगल धुनों के बीच सिरहासार भवन पहुंचे। सिरहासार भवन में प्रार्थना के उपरांत वे वहां तैयार किए गए लगभग 3 से 4 फीट गहरे वर्गाकार गड्ढे (आसन) में पालथी लगाकर बैठे और आगामी नौ दिनों के लिए कठिन तपस्या व निराहार व्रत का संकल्प लिया।
*600 वर्षों का इतिहास: रियासतकाल से चली आ रही है परंपरा*
ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, बस्तर रियासतकाल में पर्व के दौरान किसी भी प्रकार की विघ्न-बाधा, अनहोनी या अमंगल को रोकने के लिए स्वयं राजा साधना में बैठते थे। कालंतर में यह दैवीय दायित्व हल्बा समाज के पारंपरिक परिवारों को सौंप दिया गया। तभी से हल्बा समुदाय की पीढ़ियां पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ इस परंपरा का निर्वहन करती आ रही हैं।
*9 दिनों का कठोर अनुशासन और जन-आस्था*
‘जोगी बिठाई’ के बाद जोगी आगामी 9 दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए अत्यंत कठिन साधना और मौन व्रतनुमा स्थिति में लीन रहेंगे। नवरात्रि के इन नौ दिनों तक सिरहासार भवन में जोगी के दर्शन और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विजयादशमी के उपरांत हवन-पूजन एवं ‘जोगी उठाई’ की रस्म के साथ ही इस कठिन तपस्या का समापन (पारणा) होगा।
पाठजात्रा, डेरी गड़ाई और काछनगादी जैसी महत्वपूर्ण रस्मों के बाद आयोजित इस गरिमामय अनुष्ठान के दौरान दशहरा समिति के पदाधिकारी, मांझी-चालकी, पुजारी, ग-चविया तथा जोगी परिवार के सदस्य एवं बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित रहे।

