*प्रकृति और संस्कृति का अनूठा महाकुंभ: दक्षिण भारत में आज से शुरू हुआ फूलों का पर्व ‘बथुकम्मा’, पहले दिन सजी भव्य गंवई चौपालें*
*विशेष रिपोर्ट , दीपक मरकाम, दक्षिण बस्तर बतकम्मा*
देशभर में शारदीय नवरात्रि और मां दुर्गा की आराधना के ठीक एक दिन पूर्व, दक्षिण भारत के तेलंगाना और आंध्र प्रदेश राज्यों, दक्षिण बस्तर में प्रकृति, जल और नारी शक्ति के अद्भुत प्रतीक लोक पर्व ‘बथुकम्मा’ का आज भव्य आगाज हो गया है। पितृ अमावस्या (महालय अमावस्या) के पावन अवसर पर शुरू हुआ यह नौ दिवसीय फूलों का उत्सव अपनी अनूठी सांस्कृतिक छटा बिखेर रहा है।
*पहले दिन ‘इंगीली पुला बथुकम्मा’ की धूम*
पर्व के पहले दिन को ‘इंगीली पुला बथुकम्मा’ के रूप में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर सुबह से ही गांवों और शहरों की बस्तियों में युवतियों और महिलाओं में भारी उत्साह देखा गया। महिलाओं ने तंगेडु, गुनुक और गेंदे जैसे रंग-बिरंगे मौसमी और जंगली फूलों को चुनकर उन्हें बड़े करीने से मंदिर के शिखरों (गोपुरम) की तर्ज पर वृत्ताकार रूप में सजाया। इन सुंदर फूलों की रचनाओं के केंद्र में हल्दी से मां गौरी के प्रतीक रूप ‘गौराम्मा’ की स्थापना की गई।
*प्रकृति और जीवन के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक*
बथुकम्मा का शाब्दिक अर्थ है— “माँ गौरी, जीवित हो उठिए”। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जल स्रोतों, कृषि और पर्यावरण के प्रति आभार व्यक्त करने का एक प्राचीन लोक उत्सव है। पहले दिन घरों और मंदिरों में तिल और चावल के आटे से बने प्रसाद (नैवेद्य) का भोग लगाकर मां गौरी से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की गई।
*शाम को गूंजे पारंपरिक लोकगीत*
शाम ढलते ही आंगन, चौपालों और पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं और युवतियों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई। सजाई गई ‘बथुकम्मा’ के चारों ओर घेरा बनाकर तालियों की गड़गड़ाहट के साथ गाए जाने वाले पारंपरिक लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों से सराबोर हो गया है।
आने वाले नौ दिनों तक चलने वाले इस महाउत्सव में रोजाना अलग-अलग व्यंजनों का भोग लगेगा, जो अंततः नौवें दिन यानी ‘सड्डुला बथुकम्मा’ के भव्य समापन के साथ जलीय स्रोतों में विसर्जन के बाद संपन्न होगा।

