*विजयादशमी विशेष: शमी पूजन, सोना बांटने की परंपरा और नीलकंठ पक्षी के दर्शन का रहस्य** विजयदशमी पर नीलकंठ, शमी पत्र,विशेष रिपोर्ट दीपक मरकाम *
*छत्तीसगढ़ बीजापुर 20 अक्टूबर 2026*
सनातन धर्म में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयादशमी (दशहरा) का पर्व अधर्म पर धर्म, और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है। इस पावन पर्व पर रावण दहन के साथ-साथ शमी वृक्ष की पूजा, एक-दूसरे को ‘शमी के पत्ते’ (सोना) बांटने और नीलकंठ पक्षी के दर्शन करने की बेहद प्राचीन, भव्य और आध्यात्मिक परंपरा है।
आइए जानते हैं कि इन परंपराओं का रामायण व महाभारत काल से क्या ऐतिहासिक संबंध है और दशहरे पर नीलकंठ पक्षी को देखना इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है।
1. शमी के पत्तों का रामायण और महाभारत काल से गहरा संबंध,
*. रामायण काल और भगवान श्रीराम की कथा,*
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, लंकापति रावण पर आक्रमण करने और युद्ध में विजय प्राप्त करने से पहले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने आश्विन शुक्ल दशमी से पूर्व शमी वृक्ष की पूजा कर अपनी विजय का आशीर्वाद मांगा था।
इसके अलावा, एक अन्य पौराणिक कथा रघुकुल के प्रतापी राजा रघु और गुरु भक्त कौत्स से जुड़ी है। मान्यता है कि जब कौत्स ने गुरु दक्षिणा के लिए राजा रघु से स्वर्ण मुद्राएं मांगीं, तब कुबेर देव ने राजा रघु की प्रार्थना पर शमी के वृक्षों से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा कर दी थी। तभी से शमी के पत्तों को ‘सोने’ (समृद्धि के प्रतीक) का दर्जा मिल गया।
* महाभारत काल और पांडवों का अज्ञातवास*
महाभारत काल से जुड़ी कथा के अनुसार, जब पांडवों को 13 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास मिला था, तब अज्ञातवास के अंतिम समय में उन्होंने अपने शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए एक शमी के पेड़ की कोटर (शाखाओं के बीच) में छिपा दिया था।
अज्ञातवास पूरा होने के बाद विजयादशमी के दिन ही पांडवों ने शमी वृक्ष के पास जाकर अपने अस्त्र-शस्त्र वापस प्राप्त किए थे और उनकी पूजा की थी। इसके बाद उन्होंने कौरवों पर धर्मयुद्ध में विजय प्राप्त की। यही कारण है कि शमी को शौर्य, शक्ति और विजय का प्रतीक माना गया है।
2. क्यों बांटे जाते हैं शमी के पत्ते? (सोना लेने-देने की परंपरा)
दशहरे के दिन रावण दहन के बाद लोग जब घर लौटते हैं, तो एक-दूसरे को शमी या अपटा के ताजे पत्ते भेंट करते हैं। इन्हें वास्तविक सोना न मानकर समृद्धि, विजय, आत्मीयता और स्नेह का प्रतीक माना जाता है।
लोग आपस में गले मिलते हैं, शमी की पत्तियां देकर “सोना लो, सोने की तरह जीवन में चमक और तरक्की पाओ” जैसी मंगलकामनाएं देते हैं।
3. विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन इतने शुभ क्यों हैं?
दशहरे के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन को अत्यंत दुर्लभ, शुभ और सौभाग्यशाली माना जाता है। इसके पीछे कई प्रमुख पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं:
* भगवान शिव का स्वरूप: नीलकंठ पक्षी को सीधा भगवान शिव का प्रतिनिधि या स्वरूप माना जाता है। चूंकि समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने विषपान किया था और उनका कंठ नीला पड़ गया था, इसलिए उन्हें ‘नीलकंठ’ कहा जाता है। इस पक्षी का नीला गला भी उसी देवत्व और कल्याणकारी रूप की याद दिलाता है।
* श्रीराम की विजय का संकेत: पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण वध और लंका विजय के लिए प्रस्थान करते समय भगवान राम को नीलकंठ पक्षी के दर्शन हुए थे, जिसे उनकी विजय का बड़ा संकेत माना गया था।
* ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति: एक अन्य कथा के अनुसार, रावण एक प्रकांड विद्वान और ब्राह्मण था, इसलिए उसका वध करने के बाद भगवान राम को ब्रह्म हत्या का पाप लगा था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान राम और लक्ष्मण ने महादेव का स्मरण किया था, और भगवान शिव ने नीलकंठ पक्षी के रूप में आकर उन्हें दर्शन दिए थे।
यही वजह है कि विजयादशमी के दिन नीलकंठ के दर्शन मात्र से व्यक्ति के जीवन के संकट दूर होने, सोई किस्मत जागने और सालभर सुख-समृद्धि बने रहने की मान्यता है। यदि इस दिन नीलकंठ पक्षी दिख जाए, तो मन ही मन भगवान शिव और श्रीराम का स्मरण करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए:
* नीलग्रीव शुभग्रीव सर्वकामफलप्रद*
* पृथ्वियामवतीर्णोसि खञ्जरीट नमोस्तु ते*
*. विजयादशमी पर शमी पूजन की विधि-विधान*
शमी के पौधे की पूजा मुख्य रूप से अपराह्न काल (दोपहर बाद से संध्या के बीच) में करना अति शुभ माना जाता है:
* शुभ मुहूर्त एवं तैयारी: दशमी तिथि के दिन अपराह्न काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
* वृक्ष के पास पूजन: यदि आपके घर या आस-पास शमी का पौधा या वृक्ष है, तो वहां जाएं। वृक्ष के पास की भूमि को स्वच्छ कर जल अर्पित करें।
* षोडशोपचार पूजा: शमी की जड़ में जल, रोली, अक्षत (चावल), फूल और धूप-दीप अर्पित करें। यदि आपने शस्त्र या औजार रखे हैं, तो उनकी भी विधिपूर्वक पूजा करें।
* विशेष मंत्र का पाठ: पूजा के दौरान शमी वृक्ष के इस पवित्र मंत्र का उच्चारण अवश्य करें:
*शमी शम्यते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी*
*अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी*
* प्रसाद स्वरूप प्राप्ति: पूजा के पश्चात शमी के पेड़ से स्वतः गिरे हुए पत्तों या कुछ पत्तियों को आदरपूर्वक उठाकर अपने घर के मंदिर या तिजोरी में रखें। इसके बाद परिवार के बड़ों का आशीर्वाद लेकर अपनों को शमी के पत्ते (‘सोना’) भेंट करें।

