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* रोटी-बेटी के अटूट रिश्ते और सांस्कृतिक मेल का प्रतीक: दक्षिण बस्तर में हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ नौ दिवसीय ‘बतुकम्मा’ महापर्व** नवरात्रि बतकम्मा विशेष रिपोर्ट दीपक मरकाम*

* रोटी-बेटी के अटूट रिश्ते और सांस्कृतिक मेल का प्रतीक: दक्षिण बस्तर में हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ नौ दिवसीय ‘बतुकम्मा’ महापर्व** नवरात्रि बतकम्मा विशेष रिपोर्ट दीपक मरकाम*

*छत्तीसगढ़,दक्षिण बस्तर,बीजापुर,19 अक्टूबर 2026*

छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर—विशेषकर बीजापुर और इसके आसपास के सीमावर्ती जिलों—में सांस्कृतिक विविधता, प्रकृति प्रेम और आपसी भाईचारे का अनूठा संगम देखने को मिला। पिछले नौ दिनों से क्षेत्र में मातृशक्ति और प्रकृति की आराधना का पावन महापर्व ‘बतुकम्मा’  अत्यंत उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया जा रहा था, जिसका समापन अंतिम रात्रि ‘सदुदुल बतुकम्मा’  के साथ हर्षोल्लास पूर्वक हुआ।

नौ दिनों तक पंचांग और पूर्ण विधि-विधान के अनुसार मां गौरी (गौरी-गौरा) की स्थापना कर विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान श्रद्धालुओं, विशेषकर महिलाओं, पुरुषों और युवाओं में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया।

*त्रि-राज्यीय सीमा और सांस्कृतिक समन्वय का केंद्र*

दक्षिण बस्तर की भौगोलिक स्थिति इसे बेहद खास और समृद्ध बनाती है। यह क्षेत्र छत्तीसगढ़, , तेलंगाना और महाराष्ट्र की सीमाओं के मुहाने पर स्थित है। बीजापुर जिले की सीमाएं सीधे तेलंगाना और महाराष्ट्र से सटी हुई हैं, जहां जीवनदायिनी इंद्रावती नदी इस क्षेत्र की प्राकृतिक और भौगोलिक रेखा तय करती है। नदी के एक छोर पर छत्तीसगढ़ है, तो दूसरे छोर पर तेलंगाना और महाराष्ट्र राज्यों की सीमाएं शुरू हो जाती हैं।

सीमाएं भले ही अलग हों, लेकिन यहां के निवासियों के दिलों में कभी दूरियां नहीं रहीं। पड़ोसी राज्यों से निकटता के कारण दक्षिण बस्तर में मनाए जाने वाले अधिकांश तीज-त्योहार और सांस्कृतिक कार्यक्रम तेलंगाना व महाराष्ट्र की पंचांग तिथियों और परंपराओं की तर्ज पर ही मनाए जाते हैं।

*’रोटी और बेटी’ का सदियों पुराना अटूट रिश्ता*

छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र के बीच केवल व्यापारिक या भौगोलिक साझापन ही नहीं है, बल्कि यह रिश्ता सदियों से ‘रोटी और बेटी’ का रहा है:

* वैवाहिक एवं सामाजिक संबंध: छत्तीसगढ़ की बेटियों का विवाह तेलंगाना और महाराष्ट्र में होता है, वहीं वहां की बेटियां बस्तर के घरों की बहुएं बनती हैं। इस पारिवारिक और सामाजिक आदान-प्रदान ने तीनों राज्यों के रिश्तों को एक अटूट डोर में पिरो दिया है।

* व्यापारिक व सांस्कृतिक लेन-देन: स्थानीय बाजारों और दैनिक व्यापारिक गतिविधियों के लिए भी दक्षिण बस्तर के लोग पड़ोसी राज्यों पर निर्भर रहते हैं। पीढ़ियों से आकर बसे तेलंगाना और महाराष्ट्र के परिवारों का गहरा प्रभाव यहां की भाषा, खान-पान, रहन-सहन और त्योहारों में साफ झलकता है।

*क्या है ‘बतुकम्मा’ और इसका सांस्कृतिक-पौराणिक महत्त्व?*

तेलुगू भाषा में ‘बतुकम्मा’ का अर्थ “मां, जीवित हो जाओ” या “देवी मां जीवित रहें” होता है। यह पर्व मुख्य रूप से प्रकृति, जल-स्रोतों और नारी शक्ति का उत्सव है।

* फूलों की दिव्य सजावट: इस पर्व में मूर्तियों के स्थान पर प्राकृतिक और औषधीय फूलों से पूजा की जाती है। गेंदा, कमल, चमेली और स्थानीय जंगली फूलों को बांस की टोकरी या थाली पर वृत्ताकार व पिरामिड (गुंबद) के आकार में परत-दर-परत सजाया जाता है। इसके शीर्ष पर हल्दी से बनी ‘मां गौरी’ को स्थापित किया जाता है।

* अंतिम दिन का विशेष पर्व — ‘सदुदुल बतुकम्मा’: नौ दिवसीय उत्सव के अंतिम दिन को ‘सदुदुल बतुकम्मा’ (या पेड्डा बतुकम्मा) कहा जाता है। इस दिन चावल के आटे, दाल और गुड़ से पारंपरिक विशेष प्रसाद (नैवेद्य) तैयार किए जाते हैं।

* सामूहिक नृत्य और विसर्जन: अंतिम रात्रि में पारंपरिक साड़ियों में सजी-धजी महिलाओं और युवतियों ने चौराहों और प्रांगणों में फूलों से सजे बतुकम्मा को बीच में रखकर तालियों की थाप पर पारंपरिक लोकगीत गाते हुए सामूहिक नृत्य किया। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ बतुकम्मा को नदी व तालाबों में भक्तिभाव से विसर्जित किया गया।

*सांस्कृतिक एकता की मिसाल*

जल में विसर्जन के बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को प्रसाद बांटकर परिवार की सुख-समृद्धि और सुहाग की दीर्घायु की कामना की। ‘बतुकम्मा’ पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र की साझा संस्कृति और अटूट आत्मीयता का एक जीवंत उदाहरण भी है।

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