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*मोहला—–ई-ग्राम पंचायत पोर्टल ने खोली ग्राम पंचायत काग़ज़ी विकास की पोल…. पढ़े पूरी खबर*

मनीष कौशिक

मोहला—–डिजिटल इंडिया की परिकल्पना पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए की गई थी, लेकिन जब वही डिजिटल प्लेटफॉर्म भ्रष्टाचार का आईना बन जाए, तो यह सोचने का समय है कि गलती तकनीक में नहीं, नीयत में है। ई-ग्राम पंचायत पोर्टल से सामने आया ताज़ा खुलासा यही बताता है कि ग्राम पंचायतों में विकास के नाम पर काग़ज़ी खेल अब भी पूरे जोर पर है पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि जिन कार्यों को पूर्ण दर्शाकर भुगतान किया गया, वे ज़मीन पर या तो अधूरे हैं या फिर मौजूद ही नहीं हैं। नाली निर्माण, सीसी रोड, मरम्मत, स्वच्छता और अन्य बुनियादी कार्यों के नाम पर जारी बिलों और वास्तविक स्थिति में भारी अंतर दिखाई देता है। सवाल यह नहीं कि जानकारी सामने आई, सवाल यह है कि इतने समय तक यह सब कैसे चलता रहा ई-ग्राम पंचायत पोर्टल की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वह दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करता है। लेकिन यही सार्वजनिकता अब पंचायत व्यवस्था के लिए असहज हो गई है। एक ही कार्य के लिए बार-बार भुगतान, संदिग्ध दुकानों के नाम पर बिल और फर्जी मस्टर रोल—ये सब किसी तकनीकी त्रुटि के परिणाम नहीं, बल्कि सुनियोजित अनियमितताओं के संकेत हैं यह भी कम गंभीर नहीं कि निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल होती दिख रही है। जनपद से लेकर जिला स्तर तक जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे कार्यों की भौतिक सत्यापन करें, उन्होंने या तो आंखें मूंदे रखीं या फिर सब कुछ जानते हुए भी चुप्पी साधे रखी। ऐसे में केवल पंचायत प्रतिनिधियों को कटघरे में खड़ा करना अधूरा न्याय होगा ग्राम पंचायतों में होने वाला भ्रष्टाचार सीधे ग्रामीणों के हक़ पर चोट करता है। यह सड़क, पानी, सफ़ाई और बुनियादी सुविधाओं से समझौता है। विकास की राशि यदि फर्जी बिलों में बंट जाए, तो गांव पिछड़े ही रहेंगे और योजनाएं केवल पोर्टल पर “पूर्ण” होती रहेंगी अब ज़रूरत है दिखावटी कार्रवाई से आगे बढ़ने की। ई-ग्राम पंचायत पोर्टल से उजागर तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच होनी चाहिए। दोषी पाए जाने वालों से न सिर्फ राशि की वसूली हो, बल्कि आपराधिक कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए। साथ ही, सामाजिक ऑडिट को अनिवार्य और प्रभावी बनाया जाए, ताकि डिजिटल पारदर्शिता ज़मीनी सच्चाई से जुड़ सके ई-ग्राम पंचायत पोर्टल ने सच सामने रखा है। अब यह शासन-प्रशासन पर निर्भर है कि वह इस सच पर कार्रवाई करता है या फिर इसे भी एक और फाइल बनाकर छोड़ देता है। अगर इस मौके को गंवा दिया गया, तो डिजिटल पारदर्शिता पर से जनता का भरोसा भी उठ जाएगा।

 

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