Homeछत्तीसगढ़*लोक संस्कृति और आस्था का महापर्व: बथुकम्मा के पांचवें दिन 'अटला बथुकम्मा'...

*लोक संस्कृति और आस्था का महापर्व: बथुकम्मा के पांचवें दिन ‘अटला बथुकम्मा’ का हुआ भव्य और सफल आयोजन* *बतकम्मा नवरात्रि विशेष रिपोर्ट दीपक मरकाम*

*लोक संस्कृति और आस्था का महापर्व: बथुकम्मा के पांचवें दिन ‘अटला बथुकम्मा’ का हुआ भव्य और सफल आयोजन* * बतकम्मा नवरात्रि विशेष रिपोर्ट दीपक मरकाम*

*देशभर में इन दिनों में उमड़ी महिलाओं की भीड़, पारंपरिक गीतों और गूंजते मंत्रोच्चार के बीच प्रकृति और मातृ शक्ति की हुई आराधना*

 

*दिनांक 14 अक्टूबर 2026नवरात्रि , बतकम्मा पावन पर्व*

शारदीय नवरात्रि के पावन अवसर पर महिलाओं के सबसे बड़े पारंपरिक और सांस्कृतिक पर्व ‘बथुकम्मा’ का पांचवा दिन अत्यंत उत्साह, उमंग और श्रद्धा के साथ मनाया गया। बथुकम्मा उत्सव के पांचवें दिन को विशेष रूप से ‘अटला बथुकम्मा’  के रूप में मनाया जाता है। इस दिन प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए माँ गौरी (गौराम्मा) की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई।

* आकर्षक फूलों की सजावट और बथुकम्मा का निर्माण*

पांचवें दिन की शुरुआत से ही महिलाओं और युवतियों में भारी उत्साह देखने को मिला। सुबह से ही विभिन्न प्रकार के मौसमी और जंगली फूलों—जैसे तंगेदू , गुनुकू  गेंदा  और गुलदाउदी को एकत्रित किया गया।

* महिलाओं ने पारंपरिक कलात्मकता का परिचय देते हुए मंदिर के गोपुर जैसी गोलाकार और पिरामिडनुमा परतों में फूलों को बेहद खूबसूरती से सजाया।

* बथुकम्मा के बिल्कुल शीर्ष पर हल्दी से माँ गौराम्मा का स्वरूप बनाकर स्थापित किया गया, जिस पर कुमकुम और फूलों से श्रृंगार किया गया।

* विधि-विधान और पारंपरिक पूजा-पाठ*

शाम होते ही बस्तियों, गाँवों में  रोशनी और रंगोली से सजाया गया। सभी महिलाएं पारंपरिक परिधानों (विशेषकर साड़ियों और आभूषणों) में सुसज्जित होकर एकत्रित हुईं।

* परिक्रमा और गीत: सजी हुई बथुकम्मा को बीच में रखकर महिलाओं ने उसके चारों ओर घेरा बनाया और पारंपरिक लोकगीतों (बथुकम्मा पाटा) की मधुर धुनों पर तालियां बजाते हुए गोल-गोल घूमकर नृत्य किया। गीतों के माध्यम से प्रकृति, जल, और जीवनदायिनी शक्तियों की वंदना की गई।

* आरती और मंगल कामनाएं: महिलाओं ने परिवार की सुख-समृद्धि, अच्छी सेहत और अखंड सौभाग्य के लिए माँ गौरी से प्रार्थना की। इसके पश्चात पूरी श्रद्धा के साथ कपूर और दीप जलाकर आरती उतारी गई।

*’अटला बथुकम्मा’ का विशेष नैवेद्य और प्रसाद वितरण*

बथुकम्मा के प्रत्येक दिन का नाम उस दिन अर्पित किए जाने वाले विशेष प्रसाद (नैवेद्यम) के नाम पर होता है। पांचवें दिन यानी ‘अटला बथुकम्मा’ पर विशेष रूप से अट्लू  – गेहूं या चावल के आटे और दाल से बने स्वादिष्ट पैनकेक/डोसा) का भोग लगाया जाता है।

* माँ को भोग अर्पित करने के बाद उपस्थित सभी महिलाओं, बच्चों और गणमान्य लोगों में प्रसाद का बड़े प्रेम से वितरण किया गया।

* प्रसाद ग्रहण करने के बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को  पर्व की बधाइयां दीं।

*श्रद्धा और आपसी भाईचारे का संदेश*

अटला बथुकम्मा के इस पांचवें दिन के सफल आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि हमारी पारंपरिक लोक कलाएं किस प्रकार समाज को जोड़ती हैं। इस भव्य आयोजन ने एक बार फिर नारी शक्ति, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति प्रेम की अनुपम मिसाल पेश की, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।

 

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