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*बस्तर की फिज़ाओं में गूंजा ‘जय मूलनिवासी’: जगदलपुर में धूमधाम से मनाया गया विश्व आदिवासी दिवस, प्राकृतिक सजावट और सांस्कृतिक छटा ने मोहा मन*दीपक मरकाम की खबर,,

*बस्तर की फिज़ाओं में गूंजा ‘जय मूलनिवासी’: जगदलपुर में धूमधाम से मनाया गया विश्व आदिवासी दिवस, प्राकृतिक सजावट और सांस्कृतिक छटा ने मोहा मन*दीपक मरकाम की खबर,,

बस्तर जगदलपुर:

विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर में मूलनिवासी समाज द्वारा भव्य एवं उत्साहपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस दौरान पूरा शहर बस्तर की समृद्ध आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा, लोककला और प्रकृति प्रेम के रंगों में रंगा नज़र आया।

*बांस और पत्तों से सजे चौक-चौराहे बने आकर्षण का केंद्र*

आयोजन को खास और पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए शहर के प्रमुख चौक-चौराहों को बांस, पत्तों और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक शैली में सजाया गया था। प्राकृतिक संसाधनों से की गई यह अनोखी सजावट राहगीरों और शहरवासियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रही। लोगों ने रुक-रुक कर इस पहल की सराहना की, जो आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों और पारंपरिक कला को जीवंत रखने का सशक्त संदेश दे रही थी।

*पारंपरिक वेशभूषा में उमड़ा जनसैलाब*

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मूलनिवासी समाज के लोग अपनी पारंपरिक पोशाक और आभूषण धारण कर शामिल हुए। बस्तर की संस्कृति सदियों से जल, जंगल और जमीन से गहराई से जुड़ी रही है। लोकगीत, पारंपरिक नृत्य और वाद्ययंत्रों की गूंज ने पूरे माहौल को सांस्कृतिक ऊर्जा से भर दिया, जिसने प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीने का संदेश दिया।

*जल, जंगल और जमीन ही मूलनिवासी समाज के अस्तित्व का आधार: सतीश वानखड़े*

कार्यक्रम में अखिल भारतीय परिसंघ (जिला बस्तर) के जिलाध्यक्ष सतीश वानखड़े विशेष रूप से सम्मिलित हुए और आयोजन को अपना पूर्ण समर्थन दिया। समाज को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:

“बस्तर की वास्तविक पहचान केवल यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता से नहीं, बल्कि यहाँ के मूलनिवासी समाज की संस्कृति और प्रकृति के प्रति उनके गहरे जुड़ाव से है। जल, जंगल और जमीन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि यह हमारे जीवन, संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं। हमारी संस्कृति आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत है, जिसकी रक्षा करना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है।”

*नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ना समय की मांग*

सतीश वानखड़े ने युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से अवगत कराने पर जोर देते हुए कहा कि विश्व आदिवासी दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि मूलनिवासी समाज के अधिकारों, स्वाभिमान, संस्कृति और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक होने का दिन है। जब हमारे बच्चे और युवा अपनी संस्कृति को समझकर उस पर गर्व करेंगे, तभी यह धरोहर सुरक्षित रह सकेगी।

*जय भीम, जय संविधान और जय मूलनिवासी के नारों के साथ समापन*

कार्यक्रम के माध्यम से समाज को अपनी संस्कृति को बचाने, परंपराओं को आगे बढ़ाने और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहने का संकल्प दिलाया गया। अंत में आयोजकों और अतिथियों ने समस्त मूलनिवासी समाज एवं बस्तर वासियों को विश्व आदिवासी दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं दीं। पूरा प्रांगण ‘जय भीम’, ‘जय संविधान’ और ‘जय मूलनिवासी’ के गगनभेदी नारों से गुंजायमान रहा।

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