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आदिवासियों समुदाय में भी महिलाओं को संपत्ति के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला (2025 INSC 865) और आदिवासी समाज की चिंता

  • सर्व आदिवासी समाज संभागीय अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि हाल ही में 17.07.2025 को सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक फैसला सुनाया गया है जिसमें कहा गया है कि, आदिवासियों में भी महिलाओं को संपत्ति का अधिकार मिलना चाहिए, उक्त फैसला कॉस्टमरी लॉ के विपरीत है इसका पतासाजी करने से पता चलता है कि उक्त फैसला के साथ कोर्ट को एक बार और तर्क व तथ्यों के साथ अपने फैसला को देखना चाहिए। क्योंकि इस फैसले से आने वाले समय में पूरे देश में घर-घर में गृह युद्ध छिड़ने की प्रबल संभावना को नाकारा नहीं जा सकता है। घर-घर में झगड़ा होंगे, कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने पड़ेंगे, समाज केवल कोर्ट के चक्कर काटते रह जाएंगे. इसलिए माननीय सुप्रीम कोर्ट को अपने इस फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए।
  • यह मामला सूरजपुर जिले से संबंधित है जिसमें भज्जू उर्फ भजन शोरी गोंड आत्मज देवसाय गोंड, ग्राम मानपुर सूरजपुर का रहने वाला आदिवासी गोंड समाज से है जो शोरी गोत्र के हैं। जो कॉस्टमरी ला से शासित होते हैं। जिन्होने ग्राम मानपुर में राजवाड़े के समय से संपत्ति अर्जित किया था। जिनके छः पुत्र व एक पुत्री का विवाह जिला-कोरिया में हुआ था जो विवाह पश्चात ससुराल में रहने लगी थी। भजन शोरी अपने जीवन काल में ही अपनी पुत्री दइया को रहने व कुछ कमाने के लिए जमीन दे दिया था जिसमें मकान बनाकर उनके वारिस रह रहे है।
  • यह विवाद इसलिए जटिल था क्योंकि गोंड समुदाय में संपत्ति के बटवारे के नियम सामान्य हिंदू कानून से अलग होते हैं।
  • भजन शोरी जाति गोंड के 6 पुत्र हुए और एक पुत्री कुल 7 भाई-बहन हुए। एक बेटी थी जिसका नाम दइया है जिसकी शादी रगन साय टेकाम जो कोरिया/बैकुण्ठपुर के रहने वाले के साथ हुआ था। भजन शोरी के 7 बेटा-बेटी में से 6 भाइयों में एक भाई दुहा का निःसन्तान फौत हुआ। दूसरा पुत्र अमीरसाय शोरी के वंशज साधुराम और देवार का भी निःसंतान फौत हुआ। जबकि देवार की पत्नी जीवित है और वह इस जमीन का कानूनी वारिस / वाजिब हकदार है जिनके हक में जमीन जाना चाहिए था. इस मामले में वह आपत्तिकर्ता है। देवार शाह के काबिज जमीन लगभग ढाई एकड़ को उनके पिता के भांजा जो कि रगन साय का लड़का रामचरन सिंह और उसका लड़का सदन टेकाम द्वारा देवार शाह का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र और वसीयतनामा बनाकर लगभग ढाई एकड़ जमीन को अपने नाम कर लिया और उसको वर्ष 2020-22 के आसपास लगभग 17-18 टुकड़ों में प्लाटिंग करके अभा लोगों को बिक्री कर दिया। आपत्तिकर्तता सोनिया बाई (देवार शाह की पत्नी) का अभी तक सुनवाई नहीं हुआ है। सदन सिंह पिता रामचरन सिंह टेकाम द्वारा फर्जी दस्तावेज बना करके
  • देवार शाह सोरी को चाचा बना दिया जबकि सदन सिंह खुद टेकाम गोत्र का है जो देवार के लगभग ढाई एकड़ जमीन को भतीजा बन कर हड़प लिया और हड़पने के पीछे पूंजीपति वर्ग का हाथ होने से इनकार नहीं किया जा सकता। जमीन हड़पने के लिए चचेरा भाई को चाचा बना दिया गया। वत्सीयत नामांतरण के प्रकरण में सदन पिता रामचरण टेकाम कोर्ट में अपने बयान में देवार उर्फ चरण सोरी को बड़े पिता बताया है। जो कि गाँड समाज में असंभव है। इस तरीके से गलत दस्तावेज बनाकर पूरी फर्जी तरीके से गवाह ज्ञानेंद्र शास्त्री (जो कि गैर आदिवासी है जिसे गाँड समाज के रिश्ते नाते की जानकारी नहीं है) के द्वारा कूटरचित तरीके से जमीन को हड़पने और पैसा पार्टी वालों के लिए काम किया गया है इसे नकारा नहीं जा सकता।
  • गोंड समाज की परंपरा (कॉस्टमरी ला) गोंड समाज में महिलाओं को अपने पति की
  • संपत्ति पर 100 प्रतिशत अधिकार होता है। पति की मृत्यु पर पत्नी के नाम पर फौजदारी/फौती काट कर जमीन में पत्नी को चली जाती है। पत्नी की मृत्यु के बाद ही उनके बच्चों के नाम पर संपत्ति स्थानांतरित होती है। बेटी को पिता की संपत्ति में हिस्सा परंपरागत रूप से नहीं दिया जाता, क्योंकि कुल वधू प्रथा के अनुसार बेटी दूसरे कुल की सदस्य मानी जाती है। और जहां बिहाई जाती है वहां उन्हें 100 प्रतिशत की मालकिन का दर्जा प्राप्त है इसीलिए गोंड समाज में दहेज प्रथा ० प्रतिशत है, घुण हत्या नहीं होती है. महिला पुरुष में कोई असमानता नहीं है काठी (मौत मिटटी) के भी सभी रस्मों महिला ही निभाती हैं। गोंड समाज में लड़का वाला लड़की ढूंढने जाता है। गोंड समाज में कोर्ट शादी वर्जित है, जिसे समाज में मान्यता नहीं है। क्योंकि वो रस्मों रिवाज मरने के बाद कुंड़ा नेग में शामिल होने के लिए जरूरी होता है। माननीय कोर्ट में पूरे प्रकरण को देखने से यह समझ में आ रहा है कि सदन टेकाम पिता रामचरन, राम चरन पिता रगन टेकाम के द्वारा सभी अपील में अपने आप को हिंदू बताते हुए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत संपत्ति का बंटवारा चाहा गया था लेकिन सभी निचली अदालतों ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आदिवासियों पर लागू नहीं होता बोलकर खारिज कर दिया। और वैसे भी रूढ़ि प्रथा विधि के अनुसार उनका अधिकार नहीं बनता है क्योंकि वह दूसरे कुल में शादी हो करके गई थी। आदिवासी में जमीन कुल की संपत्ति होती है, इसीलिए आदिवासियों में खास करके गोंड समाज में कुल वधू प्रथा प्रचलित है जिसको माननीय सुप्प्रीम कोर्ट के द्वारा अनदेखा कर दिया गया।
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला (17 जुलाई 2025) में निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2(2) के अनुसार, अनुसूचित जनजातियों (जैसे गोंड) पर यह कानून लागू नहीं होता। कोई विशेष सरकारी अधिसूचना न होने के कारण इस कानून का इस्तेमाल गलत था। रिवाज का सवाल पर अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि गोंड समुदाय में बेटियों को हिस्सा मिलता है। प्रतिवादी भी यह साबित नहीं कर सके कि ऐसा कोई रिवाज है जो बेटियों को हिस्सा देने से रोकता हो।
  • कोर्ट ने कहा कि जब रिवाज साबित नहीं हुआ, तो इसे आधार नहीं बनाया जा सकता। ‘पितृसत्तात्मक सोच की आलोचना सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों की सोच को गलत बताया कोर्ट ने कहा कि यह पुरानी और भेदभाव वाली सोच थी, जिसे सबूत के बिना स्वीकार करना ठीक नहीं। न्याय, समानता और अच्छे विवेक के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। यह सिद्धांत सेंट्रल प्रोविंसेज लॉज एक्ट, 1875 की धारा 6 से लिया गया है। हाई कोर्ट ने गलती से माना कि यह कानून 2018 में खत्म हो गया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके सिद्धांतअभी भी लागू है। इन सिद्धांतों के आधार पर, दइया को अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए, वरना यह उसके भाइयों के साथ असमानता होगी।
  • संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार हवाला दे कर कहा कि लिंग के आधार पर भेदभाव (बेटों को हिस्सा देना और बेटियों को नहीं) अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। बेटियों को संपत्ति से वंचित करना असमानता को बढ़ावा देता है, जिसे कानून बर्दाश्त नहीं कर सकता।
  • समाज की प्रमुख आपत्तिया…
  • 1. यह फैसला गोंड समाज की कस्टमरी लॉ (रुदि प्रथा विधि) के विपरीत है।
  • 2. इससे घर-घर में संपत्ति विवाद और झगड़े बढ़ सकते हैं।
  • 3. महिलाओं पर पारिवारिक दबाव और शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना की आशंका।
  • 4. अदालतों में मुकदमों की बाढ़ आने की संभावना, जिससे वर्षों तक सुनवाई लंबित रहेगी।
  • 5. समाज की पुरानी और संतुलित परंपराएँ टूटने का खतरा, जिससे दहेज और भ्रूण हत्या
  • जैसी अमानवीय प्रथाएँ पनप सकती हैं।
  • महिला जो है एक बेटी के रूप में भी रहेगी, एक पत्नी के रूप में भी रहेगी और एक मां के रूप में भी रहेगी, यह तीनों जगह पारिवारिक तौर पर उनको जो अधिकार के तौर पर मिलेगा उसके वारिसाना हक के लिए वह क्या एक बेटी के हैसियत से कोर्ट के शरण में जाएगी या एक पत्नी के हैसियत से जाएगी या एक मां के हैसियत से जाएगी? तो उनके जीवकोपार्जन का संसाधन क्या उसके पिता, उसके पति या क्या उसके ससुर देने के लिए अक्षम है? क्या इसका जीविकोपार्जन का जो पूरा खर्च है क्या कोर्ट इसको मुहैया करा पाएगा? कितने समय तक का मुहैया करा पाएगा? कोर्ट में प्रकरण जो लंम्बे समय तक चलता है। जितने भी प्रकार के बिंदु हैं इसे सिर्फ और सिर्फ कोर्ट का व्यवहार व्यक्ति के आउट आफ पॉकेट मनी का जो है वह खत्म होगा, सेविंग नहीं के बराबर रहेगी और बेफिजूल वह जो महिला है वह हर जगह प्रताड़ित होती रहेगी, एक लड़की के रूप में भी प्रताड़ित होगी, एक पत्नी के रूप में प्रताड़ित होगी और एक माता के रूप में प्रताड़ित होगी। 
  • क्योंकि वह अपने अधिकार के तहत अपने आश्रितों को जो बाद में आगे चलकर बांटे जाएंगे उन आश्रितों को यह उनकी पूर्ति नहीं कर पाएगी उनके अधिकारों की संरक्षण नहीं कर पाएगी वह अक्षम होंगे।
  • यह फैसला एक ओर महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है. वहीं दूसरी ओर आदिवासी समाज की परंपराओं और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। 
  • जागरूकता ही बचाव है। समाज इस पर गहरी चिंता मनन कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी जिसके लिए ट्राइबल लीगल एड विंगइंडिया से लगातार चर्चा परिचर्चा जारी है।

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