*ठेकेदार , इंजीनियर की लापरवाही से भैरमगढ़ तालाब निर्माण कार्य में उठे रहे सवाल, किसान की 3.80 एकड़ जमीन डूबने के कगार पर*, दीपक मरकाम की खबर,
खेत में मेड़ बनाकर बंद किया पानी का रास्ता, कार्य का निरीक्षण हुआ या कागजों में निपट रहा काम?
बीजापुर – जल संसाधन विभाग द्वारा भैरमगढ़ में लगभग 2 करोड़ 98 लाख रुपये की लागत से तालाब जीर्णोद्धार एवं नहर मरम्मत कार्य कराया जा रहा है। मिली जानकारी के अनुसार निर्माण कार्य 69 प्रतिशत पूरा हो चुका है और करोड़ों रुपये का भुगतान भी किया जा चुका है। लेकिन इसी परियोजना के तहत किए जा रहे कार्य ने एक किसान की खेती और आजीविका पर संकट खड़ा कर दिया है। किसान का आरोप है कि ठेकेदार ने बिना सूचना और बिना सहमति के उसके पट्टे की खेत में बड़ा मेड़ का निर्माण कर दिया, जिससे वर्षों पुराना पानी निकलने का मार्ग पूरी तरह बंद हो गया है।
भैरमगढ़ निवासी किसान सुखनाथ लेकामी ने बताया कि हर वर्ष पहाड़ी क्षेत्र से आने वाला बारिश का पानी उनके खेत से होकर तालाब में पहुंचता था। यह प्राकृतिक पानी निकलने का मार्ग वर्षों से बना हुआ था लेकिन ठेकेदार द्वारा खेत के किनारे मिट्टी की बड़ी मेड़ खड़ी कर देने से पानी के निकलने का रास्ता समाप्त हो गया है। अब आगामी बारिश में पूरा पानी खेत में भरने की आशंका है, जिससे उनकी लगभग 3.80 एकड़ कृषि भूमि पानी से भर जायेगी।
किसान का कहना है कि वह पिछले एक महीने से ठेकेदार के मुंशी को लगातार समस्या बता रहा है, लेकिन हर बार केवल आश्वासन देकर टाल दिया जाता है। न तो मौके पर कोई सुधार कार्य किया गया और न ही समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस पहल की गई।
मामले में सबसे बड़ा सवाल जल संसाधन विभाग के देखरेख और इंजीनियर के निरीक्षण प्रक्रिया पर खड़ा हो रहा है। जिस स्थान पर मेड़ निर्माण किया गया है, वहां से पानी के निकला पूरी तरह बन्द होगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभागीय इंजीनियरों ने निर्माण कार्य का जमीनी स्तर पर निरीक्षण किया था? यदि निरीक्षण किया गया था तो किसान के खेत और पानी निकलने के मार्ग पर पड़ने वाले प्रभाव को क्यों नहीं देखा गया? और यदि यह स्थिति निरीक्षण के दौरान नहीं दिखी, तो क्या निर्माण कार्यों का मूल्यांकन ए सी कमरें में बैठकर कागजों में किया जा रहा है?
करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य के कारण एक किसान की पूरी खेत डूबने की स्थिति में आ गई है तो यह ठेकेदार की लापरवाही और विभाग के जिम्मेदारों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इस संबंध में जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता ए.ए. लाल से चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि वे पहले निर्माण स्थल का निरीक्षण करेंगे, उसके बाद ही मामले में कोई प्रतिक्रिया देंगे।
अब बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये की इस कार्य में किसानों के हितों और जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर आखिर किस आधार पर निर्माण कार्यों का मूल्यांकन और भुगतान किया जा रहा है। यदि समय रहते पानी के निकलने की व्यवस्था नहीं की गई तो बारिश शुरू होते ही एक किसान की खेत पानी में डूब सकती है। ऐसे में विभाग की कार्यप्रणाली और निरीक्षण व्यवस्था दोनों कटघरे में खड़ी नजर आ रही हैं।



