*लाल आतंक के साए से मुक्त हुआ बस्तर: अब गूंज रहे लोक संस्कृति के सुर, विकास और विश्वास का नया सूर्योदय*,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,* बस्तर सम्भाग जगदलपुर हैडिंग से दीपक मरकाम की खबर*
‘*बस्तर के संग’ कार्यक्रम में उमड़ा देश का नेतृत्व: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित तीन राज्यों के दिग्गजों ने की शिरकत*
बस्तर सम्भाग जगदलपुर दिनांक 19 मई 2026,
जगदलपुर : बस्तर कभी बंदूकों की गूंज, हिंसा के साए और खौफ के लिए जाना जाता था, आज वही बस्तर अपनी समृद्ध संस्कृति, अटूट जन-विश्वास और चहुंमुखी विकास का भव्य उत्सव मना रहा है। नक्सलवाद के काले साए को पीछे छोड़ते हुए बस्तर अब खुशहाली और प्रगति के एक ऐतिहासिक और नए युग में कदम रख चुका है।
इस बदलते और निखरते बस्तर की एक अविस्मरणीय और गौरवशाली झलक जगदलपुर स्थित ‘बादल अकादमी’ (Bastar Academy of Dance, Art & Literature) में देखने को मिली। अवसर था भव्य लोकसांस्कृतिक कार्यक्रम ‘बस्तर के संग’ का, जहां देश और प्रदेश के शीर्ष नेतृत्व ने एक साथ मिलकर बस्तर की जनजातीय परंपराओं का सम्मान किया और इसके उज्ज्वल भविष्य का संकल्प लिया।
*एक मंच पर जुटे देश के दिग्गज*
इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक समागम में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उनके साथ छत्तीसगढ़ के यशस्वी मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने बस्तर की माटी की इस अनूठी पहचान को पूरे देश के सामने गर्व से प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस उत्सव में छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उत्तराखंड के देवभूमि के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विशेष रूप से शिरकत की। राष्ट्रीय स्तर के इन दिग्गजों की उपस्थिति ने यह साफ कर दिया कि बस्तर का विकास और इसकी लोक संस्कृति आज देश की मुख्यधारा के केंद्र में है।
“बस्तर की लोक संस्कृति और जनजातीय परंपराओं की यह अविस्मरणीय झलक हर किसी का मन मोह लेने वाली थी। यह इस बात का सीधा और स्पष्ट संदेश है कि भय और हिंसा के दिन अब लद चुके हैं। बस्तर अब विकास, विश्वास और सुरक्षा के पथ पर तेजी से दौड़ रहा है।”
*बादल अकादमी में बिखरे बस्तर की अनूठी विरासत के रंग,*
‘बस्तर के संग’ कार्यक्रम के दौरान स्थानीय जनजातीय कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा में जब लोक नृत्यों और गीतों की प्रस्तुति दी, तो पूरा बादल अकादमी परिसर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। बस्तर की गौरवशाली विरासत, सदियों पुरानी परंपराएं और उनकी जीवंत जीवनशैली को देखकर वहां मौजूद हर शख्स मंत्रमुग्ध हो गया।
*नक्सलवाद का अंत, खुशहाली की शुरुआत*
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि बस्तर में इस स्तर के भव्य और शांतिपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों का होना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि सुरक्षा बलों और शासन की नीतियों ने नक्सलवाद की कमर तोड़ दी है। बस्तर का आम आदिवासी अब डर के साए में नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, कला और विकास के खुले आसमान के नीचे जी रहा है।
यह आयोजन सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह बदलते छत्तीसगढ़ और निखरते बस्तर की वो हुंकार है, जो बता रही है कि अब यहां केवल शांति, समृद्धि और उत्सव का राज होगा।
