Sunday, April 19, 2026

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*शिक्षा ही इस क्षेत्र के विकास और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र मार्ग – जग्गूराम तेलामी *,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,*दीपक मरकाम की रिपोर्ट*

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*शिक्षा ही इस क्षेत्र के विकास और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र मार्ग – जग्गूराम तेलामी *,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,*दीपक मरकाम की रिपोर्ट*

*युक्तियुक्तकरण को लेकर सर्व आदिवासी समाज ने राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन*

बीजापुर,,,,,,,,,,,,,,,
सर्व आदिवासी समाज, बीजापुर इकाई ने सोमवार को राज्यपाल के नाम एक महत्वपूर्ण ज्ञापन तहसीलदार को सौंपा। इस ज्ञापन में जिले की शिक्षा व्यवस्था को युक्तियुक्तकरण (rationalization) के नाम पर हो रहे कथित नुकसान से बचाने की गुहार लगाई गई है।

सर्व आदिवासी समाज के जिला अध्यक्ष जग्गूराम तेलामी ने बताया कि हमने राज्यपाल से निवेदन किया है कि वे बीजापुर जिले के आदिवासी बच्चों के शैक्षणिक स्तर को ध्यान में रखते हुए इन मांगों पर उचित निर्णय लें। उन्होंने जोर दिया कि शिक्षा ही इस क्षेत्र के विकास और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र मार्ग है।

समाज का आरोप है कि वर्तमान में चल रही युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया से बीजापुर जैसे अति पिछड़े और नक्सल प्रभावित जिले में शैक्षणिक ढाँचा पूरी तरह से चरमरा जाएगा।

ज्ञापन में मुख्य रूप से निम्नलिखित माँगें रखी गई हैं:
बीजापुर जिले में वर्तमान में संचालित किसी भी प्राथमिक या माध्यमिक शाला को युक्तियुक्तकरण के तहत बंद न किया जाए। उनकी दलील है कि कम दर्ज संख्या के आधार पर स्कूल बंद करना यहाँ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए अनुचित है।

ज्ञापन में विशेष रूप से उन प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं का जिक्र किया गया है जो नक्सल प्रभाव के कारण बंद हैं।

समाज का कहना है कि इन जगहों पर बच्चों की संख्या आज भी पर्याप्त है, और भविष्य में इन स्कूलों को पुनः संचालित किया जाना चाहिए, न कि युक्तियुक्तकरण के बहाने स्थायी रूप से बंद कर दिया जाए।

जिले में संचालित 30 पोटाकेबिन में हजारों आदिवासी बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। हालांकि, इन संस्थाओं में विषय शिक्षक और प्रधान पाठक के एक भी पद स्वीकृत नहीं हैं।

ज्ञापन में इन पदों पर तत्काल नियुक्ति की मांग की गई है।

युक्तियुक्तकरण के तहत प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं के अतिशेष शिक्षकों और प्रधान पाठकों को जिले के पोटाकेबिन विद्यालयों में समायोजित किया जाए।

आदिवासी समाज ने यह भी मांग की है कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा निर्धारित सेट-अप 2008 के अनुसार ही शिक्षकों की संख्या होनी चाहिए और इसमें किसी प्रकार की कटौती न की जाए।

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